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नहीं रहे हिंदी, उर्दू और इंग्लिश गीतों के रचनाकार नरेंद्र"उम्मीद"
January 9, 2020 • नीरज द्विवेदी • ब्रेकिंग न्यूज़

उन्नाव। हिंदी के साथ उर्दू भाषा के सुप्रसिद्ध रचनाकार कवि नरेंद्र "उम्मीद" ने बुधवार को लखनऊ केजीएमयू मेडिकल कालेज में अंतिम सांस ली। सभी के प्रति स्नेह व अपनत्व की भावना रखने वाले सरल स्वभाव के कवि नरेंद्र उम्मीद 77 वर्ष के थे। बीमारी के चलते काफी कमजोर होने के बावजूद काव्य रचना का क्रम उनका बदस्तूर जारी था। हाल ही में उनकी पहली शायरी संग्रह दर्दे दिल का प्रकाशन हुआ था। उम्मीद जी के निधन की सूचना के बाद साहित्य प्रेमियों के अलावा पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है।

चेहरे पर दाढ़ी, सिर पर रोएदार टोपी, उर्दू शब्दों का साफ-सुथरा उच्चारण, शायराना लहजा होने  के कारण साहित्यिक मंच पर गजल कार्य के रूप में आमंत्रित किए जाने वाले साहित्यकार नरेंद्र सिंह उम्मीद का निधन आज लखनऊ के केजीएमयू मेडिकल कालेज में हुआ। शिक्षक के रूप में ताउम्र अपने कर्तव्यों व पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वाहन में जीवन गुजरने के दौरान घटित हुए एक हादसे ने मनीखेड़ा निवासी नरेंद्र सिंह को तोड़ कर रख दिया था। इस हादसे में उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु हुई थी और इसका जिम्मेदार उन्होंने खुद को माना था। गुमसुम और बेरंग जीवन जीते जीते कब उन्होंने साहित्य की दुनिया मे कदम रख दिया इसका उन्हें खुद ही पता नही चल सका था। उन्होंने लिखा "जख्म जब गहरे मिला करते हैं,  लोग मरते न जिया करते हैं।  जाने वाले तुम क्या जानो, कि गम कितना खला करते हैं। हालांकि समय के साथ घर में पत्नी सीता देवी के अलावा बहू और पोते ने लंबे समय के बाद फिर उन्हें हंसाया और जिम्मेदारियों का अहसास कराया। हालांकि तब तक साहित्य के सागर में डूब चुके उम्मीद के पास एक से बढ़कर एक रचनाओं का भंडार एकत्रित हो चुका था। साहित्यिक मंचो के बजाय अकेले ही अपनी रचनाओं को गुनगुनाने की आदत ने एक से बढ़कर एक रचनाएं दी जबकि दर्द में लंबे समय तक डूबे रहने पर उन्हें उर्दू भाषा से प्यार हो गया और एक से बढ़कर एक शायरी व रूबाइयों की श्रृंखला तैयार हो गयी। आश्चर्य तो लोगो को तब हुआ जब अकेले गुलाब पर ही उनकी एक सैकड़ा रुबाइयां चर्चा में आई। उनकी गजलों में रंजो-गम, दर्द, घुटन, पीड़ा, बेबसी का बखान तो हुआ ही है जिंदगी के तनाव और अनुभव का निचोड़ भी मिलता है। उनकी गजल एक नए रास्ते पर चली है। उसमें प्रेम की बातचीत ही नहीं जीवन की विसंगतियों और विद्रूपताओ की भी अभिव्यक्ति हुई है। उनका कहना है कि "इक दर्द हमारा है, इक दर्द तुम्हारा है, दिल में हमने, दोनों को उतारा है। उम्मीद जी के निधन की सूचना पर साहित्य जगत के ही नहीं समूचे क्षेत्र में शोक की लहर है। उनका पार्थिव शरीर उनके मूल निवास मनी खेड़ा लाया गया। आज उनके निधन के बाद उनकी ही यह रचना चरितार्थ हो गयी " यादें रह गई तस्वीरें रह गईं, दर्दो ने जो लिखी तहरीरें रह गईं। जिंदगी की टूट गई कड़िया इस तरह, खंडहरों के शक्ल में जागीरें रह गईं।

हिंदी और उर्दू सगी बहनों जैसी हैं

उम्मीद जी अक्सर कहते थे गजल न मुसलमान होती है, न कविता हिंदू। यह अनुभूति के अभिव्यक्ति की विधाएं मात्र हैं। अगर गजल में प्रेम-विरह, नाज-नखरे, हुस्न-इश्क और मखमल पर पैर छिल जाने की बातें हैं तो कविता में भी "सुजाती गति पायन बिछौना मखमल के" जैसी उक्तियां कम नहीं हैं। नरेंद्र सिंह उम्मीद की गजलों में भाषा के प्रति कोई दुराग्रह नहीं है। खुले मन खुले दिमाग से उन्होंने अपनी गजलें लिखी हैं। हिंदी, उर्दू, फारसी के शब्दों का प्रयोग किया। कहीं-कहीं तो उन्होंने गजल के ढांचे को भी बदला है। उनकी ग़ज़ल "शिकवानामा सैटेनिक वर्सेज अजब सा नगीना, इन्हीं में देखा बेखौफ जीने का करीना। तस्लीमा नसरीन की लज्जा के आगे, दुनिया के फतवाइयों के माथे पर आया पसीना।


तमाम ख्यातियों के बावजूद गुमनामी के अंधेरे में थे उम्मीद

 तहसील क्षेत्र के छोटे से गांव मनीखेड़ा में 15 फरवरी 1942 को जन्में नरेंद्र सिंह पेशे से परिषदीय स्कूल में शिक्षक रहे। नरेंद्र सिंह ने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। इसी के चलते करीब पच्चीस वर्ष पूर्व उनके इकलौते बेटे ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया था। परिवार में पत्नी के अलावा विधवा बहू के आसुओं को देखकर उन्होंने अपने आंसुओं को गीत का रूप दिया। साहित्य की दुनिया में आने पर उन्होंने स्वयं को उम्मीद उपनाम दिया, जो आज उनकी पहचान है। गीत, गजल, रूबाइयां लिखते गुनगुनाते हुए उन्होंने फिल्मी दुनिया तक का सफर पूरा किया। इस दौरान उनकी तमाम अंग्रेजी रचनाओं को कई प्रांतों में पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया। इतनी ख्यातियों के बाद अब उम्र के अंतिम पड़ाव में काफी समय से बीमार चल रहे उम्मीद जी अपने गांव में गुमनामी का जीवन जी रहे थे।

जीवन परिचय....
नाम- नरेंद्र बहादुर 
साहित्यिक नाम- उम्मीद 
माता- स्मृति शेष सरयू देवी 
पिता- स्मृति शेष महेश सिंह
 जन्मतिथि 15 फरवरी 1942
 जन्म स्थान- ग्राम मनी खेड़ा 
पोस्ट- नारायणदास खेड़ा 
जनपद- उन्नाव, उत्तर प्रदेश 
शिक्षा- बीए, बीटीसी 
वृत्ति- सेवानिवृत्त शिक्षक 
कृतियां- दर्दे दिल (गजल संग्रह),
रंगे हिना (गजल संग्रह), शीत की पाती (गीत संग्रह), इंग्लिश पोएट्री  में 51 पोयम्स 
सम्मान- साहित्य श्री सम्मान 1999 गूंज अनुगूंज साहित्यिक सांस्कृतिक संगमन उन्नाव द्वारा, अलबेला साहित्य सम्मान 2017 अलबेला साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिषद द्वारा, साहित्य सेवा सम्मान 2010, बैसवारा साहित्य सम्मान 2018
विशेष- वर्ष 2002 में फिल्म "बसंती की शादी" व "हनीमून गब्बर का" के लिए गीत व ग़ज़ल लेखन, फिल्म "ये कैसा आश्रम" का टाइटल सॉन्ग, उत्तर प्रदेश सहित देश के 8 प्रांतों में सीबीएसई पाठ्यक्रम में अंग्रेजी कविताएं शामिल, देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन आदि।